Thursday, December 3, 2015

264. मकड़िओं के ये जाल फ़ुर्सत में 


मकड़िओं के ये जाल फ़ुर्सत में
कर रहे हैं निढाल फ़ुर्सत में

जाने क्यों पूछते हैं मुझसे सब
ऐसे-वैसे सवाल फ़ुर्सत में

लोग जी भरके देख लें तुझको
ख़ुद को घर से निकाल फ़ुर्सत में

लूट ले मुझको मेरे साये तू
वरना होगा मलाल फ़ुर्सत में

 जिनके होंठों पे मुस्कराहट है
पूछिए उनका हाल फ़ुर्सत में

फिर किसी को सम्हालना 'माँझी'
पहले ख़ुद को सम्हाल फ़ुर्सत में

घाट पर बैठकर तू ऐ 'माँझी'
यूँ न पानी उछाल फ़ुर्सत में
                      -देवेन्द्र माँझी

(मजबूरियाँ मेरी' से)

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