177. रोता क्यों तू झर-झर है
रोता क्यों तू झर-झर है
ये क़िस्सा तो घर-घर है
मुझको अब पहचान कहाँ
क्या शीशा, क्या पत्थर है
फेंक अमरफल हाथों से
मुक्ति सबको मरकर है
मेरा क्या है हाज़िर हूँ
बात तो सारी उनपर है
दर्द के दरवाज़े को देख
शहनाई का मंज़र है
"माँझी" शाम से क्या डरना
सूरज नाव के अन्दर है
-देवेन्द्र माँझी
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