164. दीवाना चुप रहा मैं उसे बोलता रहा
दीवाना चुप रहा, मैं उसे बोलता रहा
वो कौन-सी गिरह थी जिसे खोलता रहा
तन्हाइयों की क़ैद में तन्हाई के सबब
साया-सा मेरे चारों तरफ़ डोलता रहा
उतरा न वो किसी भी शजर पे आज तक
पंछी जो इन फ़ज़ाओं में पर तोलता रहा
बूढा फ़क़ीर जाने उसे दे गया था क्या
इक ज़हर-सा जवानिओं में घोलता रहा
मौजों ने जब भी बंद लगाया नदी-नदी
पतवार लेके "माँझी" उन्हें खोलता रहा
-देवेन्द्र माँझी
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