156. कितनी आवारागर्द हस्ती है
कितनी आवारागर्द हस्ती है
कोई घर है न कोई बस्ती है
चाँदनी रात के उजालों में
रहगुज़र धूप को तरसती है
आग उगलता है दामने-सहरा
जब भी काली घटा बरसती है
यूँ तो कहने को लोग कहते हैं
मौत अब ज़िन्दगी से सस्ती है
बिन पिए नशा हो गया "माँझी"
आज मौसम में कितनी मस्ती है
-देवेन्द्र माँझी
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