138. दीवानावार फिरता रहा हूँ तेरे लिए
दीवानावार फिरता रहा हूँ तेरे लिए
बदनाम शहर-शहर हुआ हूँ तेरे लिए
ऐ जाने-इन्तिज़ार ये सोचा भी है कभी
मरने की आर्ज़ू में जिया हूँ तेरे लिए
मस्ते-ख़िराम मेरी तरफ़ भी हो इक निगाह
राहों में संगे-मील बना हूँ तेरे लिए
तुझपर ही फैसला है मुझे कुछ ख़बर नहीं
मैं क्या जवाब दूँ कि मैं क्या हूँ तेरे लिए
हर दाग़ कह रहा है ये "माँझी" कि रात-दिन
लहरों के दरम्यान जला हूँ तेरे लिए
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. जाने-इन्तिज़ार=प्रतीक्षा की जाना अर्थात प्रेयसी, 2. मस्ते-ख़िराम=मस्त चाल, 3. संगे-मील=मील का पत्थर।
("समन्दर के दायरे" से)
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