173. ज़िन्दगी का खेल सारा शौक़िया
ज़िन्दगी का खेल सारा शौक़िया
जीत की बाज़ी भी हारा शौक़िया
इश्क़ में क्या हाल हो जाता है ये
देख लो तुम भी नज़ारा शौक़िया
उसका चेहरा ही भयानक हो उठा
जिसको शीशे में उतारा शौक़िया
फोड़कर सर मेरा वो बोले जनाब
हमने तो पत्थर ये मारा शौक़िया
किसलिए लहरों का दामन फट गया
जब कभी "माँझी" पुकारा शौक़िया
-देवेन्द्र माँझी
("क्यों सभी ख़ामोश हैं" से)
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