144. क्या हो गया कि चेहरा तेरा आफ़ताब था
क्या हो गया कि चेहरा तेरा आफ़ताब था
कल तक उरूज़ पर तेरा अहदे-शबाब था
तूने जगा के नींद की दुनिया उजाड़ दी
मैं क्या बताऊँ कौन-सा आँखों में ख़्वाब था
तुझको न चाहता तो मेरा जाने-आरज़ू
इस शहरे-नाशनास में खाना-ख़राब था
तू हुस्न है तो इश्क़ मेरा भी तो कम नहीं
गर ये सवाल था तो मेरा ये जवाब था
"माँझी" ये नाव लरज़ा-बरअन्दाम ही न थी
लहरों के दरम्याँ भी कहीं इज़्तिराब था
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. आफ़ताब=चाँद, 2. उरूज़ पर=ऊँचाई पर, 3. अहदे-शबाब=यौवन, जवानी, 4. जाने-आरज़ू =इच्छा या चाहत की जान अर्थात प्रेयसी, 5. शहरे-नाशनास=अपरिचित या अनजाना शहर, 6. लरज़ा-बरअन्दाम=डगमगाती हुई, काँपती हुई, 7. इज़्तिराब=घबराहट, बेचैनी।
("समन्दर के दायरे" से)
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