145. रुत सुहानी है दिल मचलने लगे
रुत सुहानी है दिल मचलने लगे
अब परिंदों के पर निकलने लगे
जो थे कल तक मेरे तअ़क़्कुब में
वो मेरे साथ-साथ चलने लगे
जब से देखा है इक नज़र तुझको
रात-भर करवटें बदलने लगे
शहर तारीकियों में डूब गया
मध्यम-मध्यम चिराग़ जलने लगे
गर्मिए-इश्क़ की हरारत से
दश्तो-कोहसार भी पिघलते हैं
मेरी कश्ती को छोड़कर "माँझी"
लोग अब पानिओं पे चलने लगे
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. तअ़क़्कुब=पीछा करना, 2. तारीकियों में=अँधेरे में, 3. दश्तो-कोहसार=जंगल और पहाड़।
("समन्दर के दायरे" से)
No comments:
Post a Comment