157. इस गुलिस्ताँ का कौन माली है
इस गुलिस्ताँ का कौन माली है
हर कली रंग-ओ-रूप वाली है
उसकी सूरत पे जान देता हूँ
देखने में जो भोली-भाली है
चाँद पूनम का बनके आ जाओ
आज अमावस की रात काली है
छीनकर ले गया ख़ुशी वो शख़्स
जिसने बुनियाद ग़म की डाली है
ये भी सोचा है माँगने वाले
देने वाले का हाथ खाली है
ऐ मुहब्बत तुझे ख़याल नहीं
तेरे दर का कोई सवाली है
नाख़ुदा बनाके तूने ऐ "माँझी"
नाव तूफ़ान से निकाली है
-देवेन्द्र माँझी
हर कली रंग-ओ-रूप वाली है
उसकी सूरत पे जान देता हूँ
देखने में जो भोली-भाली है
चाँद पूनम का बनके आ जाओ
आज अमावस की रात काली है
छीनकर ले गया ख़ुशी वो शख़्स
जिसने बुनियाद ग़म की डाली है
ये भी सोचा है माँगने वाले
देने वाले का हाथ खाली है
ऐ मुहब्बत तुझे ख़याल नहीं
तेरे दर का कोई सवाली है
नाख़ुदा बनाके तूने ऐ "माँझी"
नाव तूफ़ान से निकाली है
-देवेन्द्र माँझी
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