175. है बात तो छोटी-सी मगर ताव लिये है
है बात तो छोटी-सी मगर ताव लिये है
इस शहर में हर शख़्स इक उलझाव लिये है
बरगद की जटाओं से ज़रा बचके गुज़रना
अनदेखे ज़मानों के बहुत दाव लिये है
बाग़ों में तो पतझड़ ने बुरा हाल किया है
जंगल है कि इस रुत में भी बदलाव लिये है
बहता हुआ ज़ेहनों में ख़यालों का समन्दर
धरती से बड़ा सीने में इक घाव लिये है
उस पार अगर है तो मुझे लहरों पे लिख दे
"माँझी" अभी साहिल पे तेरा नाव लिये है
-देवेन्द्र माँझी
("क्यों सभी ख़ामोश हैं" से)
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