149. चन्द लम्हों के लिए मरना पड़ा
चन्द लम्हों के लिए मरना पड़ा
इस तरह से तै सफ़र करना पड़ा
वक़्त का मरहम लगाकर दोस्तो
तेज़ रिसता घाव भी भरना पड़ा
देखकर के साज़िशें इस दौर की
मुझको अपने साये से डरना पड़ा
बारहा ऐसा हुआ तेरे लिए
ज़िन्दगी को दाँव पर धरना पड़ा
बैठकर साहिल पे "माँझी" याद है
जब समन्दर रेत से भरना पड़ा
-देवेन्द्र माँझी
("समन्दर के दायरे" से)
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