158 . बैठकर कुछ देर दिल बहलाऊँ मैं
बैठकर कुछ देर दिल बहलाऊँ मैं
तेरी ज़ुल्फ़ों की घनेरी छाँव में
हर तरफ़ छाईं हैं ग़म की बदलियाँ
हादिसा कुछ हो गया है गाँव में
शमअ़ तो उनका मुक़द्दर हो गई
इस अँधेरी रात में घबराऊँ मैं
ये ख़याल आता है मुझको बार-बार
शहर की इस भीड़ में खो जाऊँ मैं
दे मुझे कोई तो मंज़िल का पता
हो गए हैं अब तो छाले पाँव में
हम तो सब "माँझी" किनारे से लगे
कश्तियाँ ही रह गईं दरियाओं में
-देवेन्द्र माँझी
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