148. देखें क्या शहरे-आर्ज़ू चल के
देखें क्या शहरे-आर्ज़ू चल के
हो गये राख सारे घर जल के
ढूँढ़ते हो चिराग़ लेकर क्या
चाँद पहुँचा गुफ़ाओं में ढलके
दास्ताँ दर्द की सुनाने को
रह गए आज भी खंडर कल के
कोई दीवाना इल्तिजा लेकर
धूल आया है जिस्म पर मलके
जब भी सूरज ज़वाल पर आया
दूर तक पहुँचे साये पीपल के
नाव भी डगमगा गई "माँझी"
मेरी आँखों से अश्क जब छलके
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. ज़वाल=अवनति, गिराव, पतन।
("समन्दर के दायरे" से)
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