174. ज़माने के लिए मैं सो रहा हूँ
ज़माने के लिए मैं सो रहा हूँ
अँधेरी वादियों में खो रहा हूँ
मिटाने के लिए कच्चे घरौंदे
पहाड़ों से मैं पत्थर ढो रहा हूँ
मैं छूने को कलियों का तबस्सुम
रहे-गुलशन में काँटे बो रहा हूँ
कहो उनसे वो शबनम से नहायें
मैं दामन आँसुओं से धो रहा हूँ
थिरकते जिस्म हैं लहरों पे "माँझी"
मैं इनके साथ पागल हो रहा हूँ
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. तबस्सुम=मुस्कराहट, 2. रहे-गुलशन=बाग़ का रास्ता, 3. शबनम=ओस।
("क्यों सभी ख़ामोश हैं" से)
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