152. धूप से साफ़ करके आँगन को
धूप से साफ़ करके आँगन को
हमने बाँधा है आज सावन को
उजड़ा-उजड़ा है रंग महफ़िल का
आग किसने लगा दी गुलशन को
मेरी उलझन अजीब उलझन है
कोई सुलझा सका न उलझन को
रोककर के वो साँस को अपनी
सुन रहा है ज़मीं की धड़कन को
ले के पतवार हाथ में "मांझी"
चीरता है भँवर के चिलमन को
-देवेन्द्र माँझी
("समन्दर के दायरे" से)
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