155. देख ले जी-भरके ऐ जाने-तमन्ना प्यार से
देख ले जी-भरके ऐ जाने-तमन्ना प्यार से
तंग आ जाऊँ न वरना इश्क़ के आज़ार से
हमसफ़र तेरी रफ़ाक़त लेके आई शहर में
मैं तो वाक़िफ़ ही न था इन कूचा-ओ-बाज़ार से
मैं तो राहों में तेरा नक़्शे-क़दम देखा किया
काफ़िले गुज़रा किये सब गर्मी-ए-रफ़्तार से
इस ख़ता पर नाम तेरा लब पे आया बार-बार
मैं उठाया जा रहा हूँ महफ़िले-अग़्यार से
गूँगे-बहरे पत्थरों से होगा इक दिन राज़ फ़ाश
पूछता हूँ मैं पता तेरा दरो-दीवार से
ले चलो कश्ती किनारे पर कि मंज़िल आ गयी
खेलते कब-तक रहोगे "माँझी" इस पतवार से
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. जाने-तमन्ना=इच्छा या चाहत की जान अर्थात प्रेयसी, २. इश्क़ के आज़ार से=प्रेम-रोग से, 3. हमसफ़र=सहयात्री, 4. रफ़ाक़त=मैत्री, दोस्ती, 5. कूचा-ओ-बाज़ार से=गली और बाज़ार से, 6. नक़्शे-क़दम=पाँव के निशान, 7. काफ़िले=यात्रीदल, 8. गर्मी-ए-रफ़्तार से=तेज़ी से, 9. महफ़िले-अग़्यार से=पराये लोगों की सभा से अर्थात प्रतिद्वंद्वी और रक़ीबों की सभा से।
("समन्दर के दायरे" से)
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