168. नहीं है घर कोई बेघर दिखाई देता है
नहीं है घर कोई बेघर दिखाई देता है
जो मुझको ख़्वाब में अक्सर दिखाई देता है
भुला चुका है मुहब्बत की तयशुदा शर्तें
वो जिसके हाथ में ख़ंजर दिखाई देता है
यहीं पे शजरे-मुहब्बत की छाँव क़त्ल हुई
जहाँ पे धूप का लश्कर दिखाई देता है
मिलेगा क्या कोई पुरसाने-हाल रात गए
हरेक लम्हा सितमगर दिखाई देता है
हुई हैं कैसे फ़ना जाने सरफिरी मौजें
बुझा-बुझा सा समन्दर दिखाई देता है
न सुन सकेगा कोई भी तेरी सदा "माँझी"
ये शहर घाट पत्थर दिखाई देता है
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. शजरे-मुहब्बत=प्रेम-वृक्ष, 2. पुरसाने-हाल=हाल पूछनेवाला, 3. सितमगर=ज़ुल्म ढ़ानेवाला, 4. फ़ना=नाश जाना, 5. सदा=आवाज़।
("क्यों सभी ख़ामोश हैं" से)
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