202. ऐसा भी काम दोस्तो करना पड़ा मुझे
ऐसा भी काम दोस्तो करना पड़ा मुझे
बदनाम उस शहर से गुज़रना पड़ा मुझे
मेरी वजह से लोग ये सारे उदास हैं
क़िस्तों में इस ख़याल से मरना पड़ा मुझे
जब भी लिखे थे ख़त किसी सूरज के नाम पर
अन्धे दीये की लौ में उतरना पड़ा मुझे
देखे गए न छाँव में ठिठुरे हुए बदन
आँगन तमाम धूप से भरना पड़ा मुझे
आसाँ नहीं था नाव को तूफाँ से खींचना
'माँझी' सिमट-सिमट के बिखरना पड़ा मुझे
-देवेन्द्र माँझी
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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