Wednesday, September 30, 2015


 218. ज़िन्दगी कुछ भी हो ये आज बताना है मुझे 

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ज़िन्दगी कुछ भी हो ये आज बताना है मुझे 
कौन-सा क़र्ज़ है वो जिसको चुकाना  मुझे 

आँधियाँ आके दो-राहे पे खड़ी हो जाएँ 
इक नया दीप सरे-राह जलाना है मुझे 

शीश-महलों की चमक देखके तेरी ख़ातिर 
संग-रेज़ों से ख़राबे को सजाना है मुझे 

देखता क्या है तू मुड़-मुड़के तेरा साया हूँ 
साथ आया हूँ तो फिर साथ ही जाना है मुझे 

जब ये महिवाल है सोहनी का दीवाना 'मांझी'
फिर तो ये कच्चा घड़ा पार लगाना  मुझे 
                                       -देवेन्द्र माँझी          

शब्दार्थ--1. संग-रेज़ों से=पत्थर के टुकड़ों से, 2. ख़राबे को=बर्बाद घर को, खण्डहर को। 
                                   

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