218. ज़िन्दगी कुछ भी हो ये आज बताना है मुझे
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ज़िन्दगी कुछ भी हो ये आज बताना है मुझे
कौन-सा क़र्ज़ है वो जिसको चुकाना मुझे
आँधियाँ आके दो-राहे पे खड़ी हो जाएँ
इक नया दीप सरे-राह जलाना है मुझे
शीश-महलों की चमक देखके तेरी ख़ातिर
संग-रेज़ों से ख़राबे को सजाना है मुझे
देखता क्या है तू मुड़-मुड़के तेरा साया हूँ
साथ आया हूँ तो फिर साथ ही जाना है मुझे
जब ये महिवाल है सोहनी का दीवाना 'मांझी'
फिर तो ये कच्चा घड़ा पार लगाना मुझे
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. संग-रेज़ों से=पत्थर के टुकड़ों से, 2. ख़राबे को=बर्बाद घर को, खण्डहर को।
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