207. ऐसे आँखों में धुँधलके छा गए
ऐसे आँखों में धुँधलके छा गए
सामने मंज़िल के धोखा खा गए
ग़ैर पर नज़रे-इनायत देखकर
हम तेरी महफ़िल से उठकर आ गए
किसलिए ये ग़म की बदली छा गई
फूल क्यों बादे-सबा मुरझा गए
बेनियाज़ी का हमें कुछ डर नहीं
लोग अब तो तेरी आदत पा गए
उनसे मिलना भी क़यामत हो गया
सैकड़ों इल्ज़ाम सर पर आ गए
जाके किससे हाले-दिल 'माँझी' कहे
ज़ख़्म सीनों के वो सब दिखला गए
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. नज़रे-इनायत=मेहरबानी, 2. बादे-सबा=प्रात:कालीन ख़ुशबू भरी मोहक हवा, समीर, 3. बेनियाज़ी=उपेक्षा, 4. हाले-दिल=दिल का हाल।
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