209. रूठनेवाले को घर जाके मनाना होगा
रूठने वाले को घर जा के मनाना होगा
दर्द दिल में है तो फिर ज़ख़्म छिपाना होगा
हिज्र की रात में आवाज़ मैं दूँगा तुझको
गर मुहब्बत हर हाल में आना होगा
उन घरौंदों में अँधेरों का बसेरा है जहाँ
शाम होते ही चराग़ों को जलाना होगा
गर्दिशे-वक़्त तेरे साथ ये मालूम न था
आसमानों का मुझे बोझ उठाना होगा
वो परी-चेहरा जो आ जाए चमनज़ारों में
उनकी ज़ुल्फ़ों में गुलाबों को सजाना होगा
सोते पानी में कहाँ नाव चलेगी 'माँझी'
अपनी पतवार से लहरों को जगाना होगा
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. हिज्र=विरह, जुदाई, वियोग, 2. गर्दिशे-वक़्त=बुरा समय, परेशानियों भरा समय, 3. परी-चेहरा=परी या हूर की तरह सुन्दर चेहरेवाली, 4. चमनज़ारों=उपवनों में, बाग़ों में।
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