199. रात माना बड़ी सुहानी है
रात माना बड़ी सुहानी है
यादे-माज़ी की इक निशानी है
जानता हूँ तेरा ख़फ़ा होना
जानेमन ये अदा पुरानी है
इसपे क्यों एतिबार कर बैठे
ये हक़ीक़त नहीं कहानी है
महविशों में है महताब वही
देखने में जो पानी-पानी है
शोर में नाव रोक मत 'माँझी'
चढ़ते दरिया की ये रवानी है
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. यादे-माज़ी=बीते समय की याद, भूतकाल की याद, 2. महविशों=तारे. सितारे, 3. महताब=चाँद।
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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