187. राह में क्या चीज़ आकर अड़ गई
राह में क्या चीज़ आकर अड़ गई
ज़िन्दगी की चाल धीमी पड़ गई
भूल बैठा सारी तन्हाई का ग़म
आँख से जब आँख उसकी लड़ गई
देखकर धरती पे सूरज का जमाल
चाँद की सारी सफ़ेदी झड़ गई
उनका नंगा रक़्स भी क्या रक़्स था
शर्म से दुनिया ज़मीं में गड़ गई
आज तो इक लहर "माँझी" तैश में
मुँह पे साहिल के तमाचा जड़ गई
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. जमाल=तेज, चमक, आभा, 2. रक़्स=नृत्य, नाच।
("क्यों सभी ख़ामोश हैं" से)
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