216. मेरे लिखे हुए को किताबों में देखना
मेरे लिखे हुए को किताबों में देखना
आइन्दा फिर कभी मुझे ख़्वाबों में देखना
आ जाएँगे वो आईने में खुलके सामने
गुज़रे हुए समय को निक़ाबों में देखना
आये अगर न बाज़ मुहब्बत के खेल से
उनका भी हश्र खाना-ख़राबों में देखना
मासूम भोली-भाली सी कलिओं की मस्तियाँ
जब ये जवान हो तो हिजाबों में देखना
साहिल पे अब नज़र नहीं आएँगे फिर कभी
'माँझी' अब उनका नाम हुबाबों में देखना
-देवेन्द्र माँझी
-शब्दार्थ--1. निक़ाबों में=परदे में, घूँघट में, 2. हश्र=परिणाम, 3. हिजाबों में=पर्दों में, 4. हुबाबों में=बुलबुलों में।
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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