204. धूप से साफ़ करके आँगन को
धूप से साफ़ करके आँगन को
हमने बाँधा है आज सावन को
उजड़ा-उजड़ा है रंग महफ़िल का
आग किसने लगा दी गुलशन को
मेरी उलझन अजीब उलझन है
कोई सुलझा सका न उलझन को
रोककर के वो साँस को अपनी
सुन रहा है ज़मीं की धड़कन को
लेके पतवार हाथ में 'माँझी'
चीरता है भँवर के चिलमन को
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. चिलमन=घूँघट।
(' सभी ख़ामोश हैं' से)
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