201. मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया
मुझको जब मुश्किल में जीना आ गया
दुश्मनों को भी पसीना आ गया
अब न ढूँढ़ेंगे रफ़ूगर शहर में
ऐ मुहब्बत चाक सीना आ गया
साक़िया ये साग़रो-मीना उठा
मुझको पीने का क़रीना आ गया
मुझको तो एक बूँद पानी है गराँ
तुझको कैसे ज़हर पीना आ गया
आँख ही उस वक़्त 'माँझी' की खुली
जब किनारे पर सफ़ीना आ गया
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. गराँ =तीखि. कडुवी।
('क्यों सभी ख़ामोश हैं' से)
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