60. शरारत आँधियों की वो कभी बिजली की पाती है
शरारत आँधियों की वो कभी बिजली की पाती है
जो चिड़िया चोंच में रोज़ाना तिनके लेके आती है
इलाही ख़ैर करना इक क़यामत हो रही बरपा
किसी की रूह मेरी रूह में आकर समाती है
गली के मोड़ पर रहती है वो जो बावली बुढ़िया
मुझे ही देखकर क्यों ज़ोर से ठहाके लगाती है
कँटीली झाड़ियों पर जो पड़ी है, रामनामी है
ये चादर इस नए युग में भला किसको सुहाती है
तू "माँझी" नाव अपनी लेके चल उस पर दरिया के
ये दुनिया तो नए फ़ितने यहाँ अक्सर उठाती है
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. क़यामत=प्रलय, 2. बरप=उपस्थित, खड़ी, 3. रूह=आत्मा, 4. बावली=पागल, 5. फ़ितने=उपद्रव, फ़साद।
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