86. चल दिया है बीज वो उल्फ़त के बोकर
चल दिया है बीज वो उल्फ़त के बोकर
सींच भी लो सबके सब तुम एक होकर
हाँ, रखैलों की तरह सिसकी बहुत है
ज़िन्दगी मेरे बदन में क़ैद होकर
कल मेरे ही दम से जाना जाएगा
मारता है जो ज़माना आज ठोकर
क्या परेशानी है तुझको ये बता तू
साथ क्या लाया था जो जाएगा खोकर
राम की गंगा हुई मैली जो "माँझी"
साफ़ कर लहरों का दामन आज धोकर
-देवेन्द्र माँझी
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