68. गुलाबों की महक वाला वो मंज़र छोड़ दूँ कैसे
गुलाबों की महक वाला वो मंज़र छोड़ दूँ कैसे
कि दिल की इस ज़मीं को मैं यूँ बंजर छोड़ दूँ कैसे
अभी तो चाँद-तारे भी चमक देते हैं बढ़-चढ़कर
अभी फिर ख़्वाब से महका मैं बिस्तर छोड़ दूँ कैसे
मेरे ख़्वाबों की वो ताबीर है जो मुझसे रूठी है
भिखारिन की तरह उसको मैं दर-दर छोड़ दूँ कैसे
अमानत में ख़यानत से कहाँ डरता है अब कोई
पड़ौसी के भरोसे मैं खुला घर छोड़ दूँ कैसे
नहीं "माँझी" अगर सीखा हुनर नल-नील का अब तक
किसी के नाम का पानी पे पत्थर छोड़ दूँ कैसे
-देवेन्द्र माँझी
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