56. वो भी क्या कुछ ज़िन्दा है
वो भी क्या कुछ ज़िन्दा है
ख़ुद से जो शर्मिन्दा है
पीपल नीचे छाँव नहीं
ये कहना पर-निन्दा है
नीड़ बनी है देह मेरी
जीवन एक परिन्दा है
जान सकी ना बस्ती ये
कैसा ये बाशिन्दा है
छेड़े वो लहरों के तार
"माँझी" क्या साज़िन्दा है
-देवेन्द्र माँझी
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