43. जायज़ा ले लूँ ज़रा इस शहर के हालात का
जायज़ा ले लूँ ज़रा इस शहर के हालात का
फिर वज़न भी देख लूँगा मैं तुम्हारी बात का
फोड़ दे ना कोई पत्थर अब बहाने का इसे
हाँ, लबालब हो रहा है ये घड़ा जज़्बात का
मौत की इस माँग का सिन्दूर मैं पौंछूं ज़रा
फ़ैसला हो जाएगा फिर जीत का और हार का
देखकर जिसको सभी बेहाल से थे ख़ौफ़ से
आख़िरी मंज़र नहीं था वो भयानक रात का
डूबती कश्ती अगर तूफ़ान में तो ग़म न था
तब्सिरा "माँझी" करूँ क्या मौज के आघात का
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. तब्सिरा=समीक्षा, 2. मौज=लहर.
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