Tuesday, June 30, 2015

ग़ज़ल के समन्दर में माँझी के जल्वे


 ग़ज़ल के समन्दर में माँझी के जल्वे 

देवेन्द्र माँझी की ग़ज़लों के सन्दर्भ में बात की जाए और "समन्दर के दायरे" पर नज़र डाली जाए तो कहना होगा कि देवेन्द्र माँझी ने इस दिशा में विशाल तटहीन सागर में भरपूर गोते लगाए हैं। संवेदना की सीपियाँ चुनीं हैं और अनेक सीपियाँ मोतिओं की शक्ल में सामने आईं हैं। मैंने माँझी को आज से लगभग तीन दशक पहले (लगभग-1987-88 में) एक होनहार ग़ज़लकार रूप में जाना था और उनकी ग़ज़ल-संबंधी संभावनाओं को पहचाना था। 
     उल्लेख्य है कि माँझी ग़ज़ल-रचना की दिशा में निरन्तर गतिशील है और अब-तक उनके पाँच ग़ज़ल-संग्रह प्रकाश में आ चुके हैं। यों, यह कतई महत्त्वपूर्ण नहीं है. क्योंकि ग़ज़ल की दुनिया में छह-छह, सात-सात संकलन प्रकाशित कराने वाले अनेक कवि/ शायर हैं, जबकि मिर्ज़ा ग़ालिब और दुष्यंत कुमार के मात्र एक-एक संकलन ही आये और वे ग़ज़ल के आकाश पर छा गए। इसलिए, यह किंचित भी महत्त्व का विषय नहीं है कि आपके कितने संकलन प्रकाशित हुए हैं। महत्त्वपूर्ण तो यह है कि आपने जो लिखा/ कहा है वह कितना क़ाबिले-ग़ौर है और ग़ज़ल के ताज में श्रेष्ठ अश्आर के कितने नगीने जड़े गए हैं तथा कविता को किस मुकाम पर पहुँचाया गया है। 
     कहना चाहूँगा कि देवेन्द्र माँझी ने अपने स्तर पर कुछ ऐसा कर दिखाया है कि उसकी प्रतिभा और कल्पनाशीलता की भूरि-भूरि प्रशंसा की जा सकती है। ग़ज़ल में "मक़्ता" का मुकाम बड़ा अहम् है।  "मक़्ता" अर्थात ग़ज़ल के आख़िरी शे`र में अपने उपनाम का समावेश करना। देवेन्द्र ने अपने "माँझी" उपनाम को अपनी ग़ज़लों के प्रत्येक अंतिम शे`र में इतनी ख़ूबसूरती से पिरोया है कि वाह-वाह करने को मन करता है। 
       सभी जानते हैं कि ग़ज़ल के आख़िरी शे`र में मक़्ता के प्रयोग की एक समृद्ध परम्परा रही है।  मिर्ज़ा ग़ालिब, फ़िराक़ गोरखपुरी, फ़ैज़ अहमद "फ़ैज़" सभी ने अपने-अपने अंदाज़ में मक़्ते का प्रयोग किया है। हिन्दी के ग़ज़लकारों में त्रिलोचन, बलबीर सिंह "रंग" और गोपालदास नीरज ने भी इस परम्परा का निर्वाह किया है। नि:संकोच कहा जा सकता है कि बलबीर सिंह रंग ने अपने समय में "रंग" उपनाम को मक़्ते में अनेक बार सार्थक शैली में पिरोया है, यथा--
  " रंग ज़माने का कुछ और ही है 
    शायरी से गुज़र कहाँ होगी?
                   या--
  "रंग का रंग ज़माने ने बहुत देखा है 
   क्या कभी आपने बलबीर से बातें की हैं"
     इसके बाद अनेक कवि/ शायरों ने मक़्ते  का प्रयोग किया मगर जो बात "रंग" के मक़्ता-प्रयोग में थी, वह दूसरों के यहाँ पूर्णत: उभरकर सामने नहीं आई। दुष्यंत ने कभी "परदेशी" उपनाम रखा था मगर ग़ज़लों तक आते-आते वे "परदेशी" नहीं रहे थे, इसलिए उपनाम-प्रयोग का सवाल ही नहीं उठा।  उसके बाद बालस्वरूप राही ने मक़्ते के कुछ सटीक प्रयोग अवश्य किए।  इस सन्दर्भ में मुझे अपने गुरु आचार्य कृष्ण कुमार कौशिक का स्मरण आ रहा है। कौशिक जी का उपनाम वैसे तो "दिनेश" था मगर गज़लें कहने के लिए उन्होंने एक और उपनाम "हृदय" अपना लिया था।  मक़्ते के प्रयोग-प्रसंग में उनकी ये पंक्तियाँ रह-रहकर याद आ रही हैं--
     "हृदय" और क्या दूँ, हृदय दे चुका हूँ 
        हृदय से गया मैं दुलारा नहीं हूँ"
     उल्लेख्य है कि कौशिक जी ने अपनी अनेकानेक ग़ज़लों में मक़्तों के रूप में "हृदय" उपनाम का ख़ूबसूरत ढंग से इस्तेमाल किया। 
      उपर्युक्त काव्य-मर्मज्ञों एवं रचनाकारों की छाया में जब मैं अपेक्षाकृतनए ग़ज़लकार देवेन्द्र माँझी के मक़्ता-प्रयोग पर नज़र डालता हूँ तो चकित रह जाता हूँ। देवेन्द्र माँझी ने अपने "माँझी" उपनाम को अपने मक़्तों में जिस ख़ूबी और कौशल से पिरोया है, वह निश्चय ही विस्मयकारी है। उन्होंने माँझी शब्द को नदी, तूफ़ान, नाव, भँवर, दरिया, समन्दर, लहर, तट, रवानी, मौजों, थपेड़ों, साहिल और पतवार जैसे अनेक शब्दों को रूपकों में ढालकर बला की ख़ूबसूरती पैदा की है। कुछ उदाहरण देखिये--
  "माँझी" को काटने दो समन्दर के दायरे 
  अब आ गयी है हाथ में पतवार चुप रहो 

इतना कोहरा था कि साहिल भी दिखाई न दिया 
"माँझी" इस नाव को दरिया में घुमाता कैसे 

मेरे सिवा इस घाट पे कोई भी तो "माँझी"
तूफ़ान से टकराने को तैयार नहीं था 

सारी दुनिया ही किनारे पे खड़ी है "माँझी"
अपनी इस छोटी-सी कश्ती में बिठाऊँ किसको 

बीच तूफाँ के कोई चीख रहा है "माँझी"
मेरी कश्ती को किनारे से लगा दे कोई 

चल कहीं "माँझी" उठा पतवार अपने हाथ में 
अब सहा जाता नहीं मौजों का साहिल पे सितम 

      ये कुछ उदाहरण हैं माँझी के मक़्ता-प्रयोग के। सचमुच ये उदाहरण माँझी की प्रतिभा, ग़ज़लगोई की सामर्थ्य और कहन के विभिन्न रंगों की गवाही देने के लिए काफ़ी है। कहना होगा कि उनसे पहले की पीढ़ी और समकालीन-पीढ़ी के अनेक ग़ज़ल-गो कवि/ शायरों ने उपनाम अर्थात तख़ल्लुस रखे मगर अपनी ग़ज़लों में उपनाम के प्रयोग को उतना सटीक अंदाज़ नहीं दे पाये जैसाकि देवेन्द्र माँझी ने कर दिखाया।
        यह सच है कि देवेन्द्र माँझी ने ग़ज़लों को रवायती अंदाज़ में कहा। उनके यहाँ रदीफ़-क़ाफ़िया बहुत अधिक नया करने की वाञ्छा भी नहीं झलकती। "अलिफ़" के क़ाफ़िया का उन्होंने भी अनेक जगह प्रयोग किया है मगर फिर भी पुराने अंदाज़ में "माँझी" का अपना अंदाज़ पिरोने में वे किसी से पीछे नहीं रहे। उन पर उर्दू शायरी का पुख़्ता असर इसलिए भी है कि उन्होंने ग़ज़ल में उर्दू की रंगत को हिन्दी मुहावरों की अपेक्षा अधिक मात्रा में ग्रहण किया है। उनके अशआर मँजे हुए कवि/ शायर की मेधा की सूचना देते हैं, यथा--

मैं तो अनजान मुसाफ़िर हूँ भटकनेवाला 
मेरी मंज़िल का पता हो तो बता दे कोई 

क़ैदे-तन्हाई में घुट-घुट के न मर जाऊँ कहीं 
उनकी महफ़िल में मेरा हाल सुना दे कोई

कहना होगा कि देवेन्द्र माँझी की ग़ज़लों में ग़ज़लियत के रंग सही ढंग से झलकते हैं और उभरते हैं।  उन्हें कोई भी गायक अपने सुरों में पिरो सकता है, कोई भी दानिशमंद उन्हें उद्धृत कर सकता है और भविष्य का कोई भी छात्र उन्हें श्रेष्ठ पंक्तिओं के रूप में याद कर सकता है। ग़ज़ल की नई पीढ़ी में माँझी का नाम और काम सम्मान का हक़दार है, ऐसी मेरी मान्यता है। "समन्दर के दायरे" के इस तृतीय-संस्करण के प्रकाशन पर माँझी को मेरी अनेकानेक हार्दिक शुभ-कामनाएँ।
                                                                                                                                         -शेरजंग गर्ग
(नोट--"समन्दर के दायरे" के तीसरे संस्करण के प्रकाशन अवसर पर सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. शेरजंग गर्ग ने जनवरी-2008 में यह भूमिका लिखी थी )

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