90. क्यों न इस शहर को अब आग लगा दी जाए
क्यों न इस शहर को अब आग लगा दी जाए
महफ़िले-यार को शोलों से सज़ा दी जाए
अब तो आँखों को गुलिस्ताने-इरम चुभता है
क्यों न ऐ मौजे-सबा ख़ाक उड़ा दी जाए
चाँदनी रात में अनदेखे बदन जलते हैं
इनको बर्फाब-पहाड़ों की हवा दी जाए
आज निकला है वो बन-ठन के क़यामत ढाने
आस्माँ-मशअले-ख़ुर्शीद बुझा दी जाए
कब से गर्दाब से तुम खेल रहे हो "मांझी"
अब तो ये नाव किनारे से लगा दी जाए
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. महफ़िले-यार=दोस्तों की सभा, 2. गुलिस्ताने-इरम=स्वर्ग का बाग़, 3. मौजे-सबा=समीर, सुबह की ठण्डी हवा, 4. बर्फाब-पहाड़ों=बर्फ़ीले पहाड़, 5. क़यामत=प्रलय, 6. आस्माँ-मशअले-ख़ुर्शीद=आकाश की ज्योति अर्थात सूर्य, 7. गर्दाब=तूफ़ान।
नोट- मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से जो 1985 में प्रकाशित हुआ
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