122. कोई मिलता ही नहीं ज़ख़्म दिखाऊँ किसको
कोई मिलता ही नहीं ज़ख़्म दिखाऊँ किसको
इस बड़े शहर में हमराज़ बनाऊँ किसको
रात अंधी है अँधेरे में बसर कर लूँगा
मैं अकेला हूँ तो फिर शमअ़ जलाऊँ किसको
उनकी यादें हैं मिरे दिल में अमानत ऐ दोस्त
ऐसी सूरत हो तो फिर कैसे भुलाऊँ किसको
कोई भी तो नहीं हँस-हँस के गुज़रनेवालो
मुझपे क्या गुज़री है ये राज़ बताऊँ किसको
क़ाफ़िलेवालो किसी और के पीछे चलना
मेरी मंज़िल है जुदा साथ लगाऊँ किसको
सारी दुनिया ही किनारे पे खड़ी है "माँझी"
अपनी इस छोटी-सी कश्ती में बिठाऊँ किसको
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. हमराज़=रहस्य जाननेवाला।
("समन्दर के दायरे" से)
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