107. सर पे चढ़ते हुए तूफ़ान उतर जाएँगे
सर पे चढ़ते हुए तूफ़ान उतर जाएँगे
आज़माइश के ये लम्हे भी गुज़र जाएँगे
पहले तै कर लो दोराहे से अभी दूर हैं हम
मैं किधर जाऊँगा और आप किधर जाएँगे
आग बरसा ले खुले दश्त में सूरज बनके
धुंध में लिपटे हुए जिस्म निखर जाएँगे
स्याह ज़ुल्फ़ों को न लहर कि तेरे दीवाने
तुझको इस हाल में देखेंगे तो डर जाएँगे
कैसे सरसब्ज़ हो सूखी हुई बंजर धरती
ये नदी-नाले तो बरसात में भर जाएँगे
ढूँढ पाएगा न तूफ़ान-ए-बला भी "माँझी"
मौज-दर-मौज समन्दर में बिखर जाएँगे
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. दश्त=जंगल, 2. सरसब्ज़=हरा-भरा, 3. तूफ़ान-ए-बला=भयानक तूफ़ान, 4.मौज-दर-मौज=लहर-लहर।
(यह ग़ज़ल मेरे मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से है, जिसका प्रकाशन आज से तीस साल पहले 1985 में हुआ था )
No comments:
Post a Comment