91. निकले जो घर से उनके नज़ारे मिले हमें
निकले जो घर से उनके नज़ारे मिले हमें
दिलकश हसीन रात के तारे मिले हमें
उनके बग़ैर जीने की हसरत थी नातमाम
अच्छा हुआ कि उनके सहारे मिले हमें
हम संगे-मील बनके खड़े हैं तेरे लिए
उस रास्ते पे जिसके इशारे मिले हमें
बादे-सबा मज़ाक़ ये कैसा हमारे साथ
फूलों की चाह की तो शरारे मिले हमें
"माँझी" ही लाया नाव भँवर से निकाल के
क़िस्मत बुलन्द थी तो किनारे मिले हमें
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. हसरत=चाह, इच्छा, 2. नातमाम=अतृप्त , अपूर्ण, 3. संगे-मी=मील का वह पत्थर जो दूरी बताने के लिए सड़क के किनारे लगा होता है, 4. बादे-सबा=समीर, सुबह की ठण्डी हवा, 5. शरारे=चिंगारियाँ।
मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से
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