118. पहले तो कभी तालिबे-दीदार नहीं था
पहले तो कभी तालिबे-दीदार नहीं था
इतना मैं तेरे इश्क़ में बीमार नहीं था
चलकर के जहाँ जिंस-ए-मुहब्बत को ख़रीदें
इस शहर में ऐसा कोई बाज़ार नहीं था
जाँ लेके जाँ-बख़्शी का अंदाज़ नया है
अब कहते हो वो शख़्स गुनहगार नहीं था
ऐ जाने-वफ़ा आख़िरे-शब सोच रहा हूँ
वादा था फ़क़त मिलने का इक़्रार नहीं था
होता था सरे-शाम मेरी राह में हाइल
दीवार था वो साया-ए-दीवार नहीं था
ले-लेके मेरे नाम को करता रहा बदनाम
हालाँकि मेरे नाम से बेज़ार नहीं था
मेरे सिवा इस घाट पे कोई भी तो "माँझी"
तूफ़ान से टकराने को तैयार नहीं था
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. तालिबे-दीदार=दर्शनाभिलाषी, देखने या मिलाने का इच्छुक, 2. इश्क़ मे=प्यार में, 3. जिंस-ए-मुहब्बत =प्यार नामक वस्तु, 4. जाँ-बख़्शी=जीवनदान, 5. गुनहगार=अपराधी, पापी, 6. जाने-वफ़ा=वफ़ा की जान यानी प्रेयसी, 7. आख़िरे-शब=रात का पिछला पहर, 8. फ़क़त=मात्र, केवल, 9. इक़्रार=सहमति, वचन, 10. हाइल =आड़े आना, रास्ते की रुकावट बनना, 11. साया-ए-दीवार=दीवार की परछाईं, 12. बेज़ार=ऊबा हुआ।
("समन्दर के दायरे" से)
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