111. मुझसे हुआ है इश्क़ का इज़हार चुप रहो
मुझसे हुआ है इश्क़ का इज़हार चुप रहो
इतने से ज़ुर्म का हूँ गुनहगार चुप रहो
ना-आशना है शहरे-तलब की गली-गली
मैं अजनबी हूँ कूचा-ओ-बाज़ार चुप रहो
इस अंजुमन में ज़ब्ते-मुहब्बत भी चाहिए
क्यों खींचते हो म्यान से तलवार चुप रहो
था मैं ही उस मकान से निकला हुआ वो शख़्स
मैं क्या था, कौन था, दरो-दीवार चुप रहो
उड़ने लगेगी धूल अगर उसने सुन लिया
पतझड़ खड़ा है सर पे चमनज़ार चुप रहो
"माँझी" को काटने दो समन्दर के दायरे
अब आ गई है हाथ में पतवार चुप रहो
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. इज़हार=व्यक्त, 2. ना-आशना=अपरिचित, अनजान, 3. शहरे-तलब=ऐछिक नगर, 4 . कूचा-ओ-बाज़ार=गली और बाज़ार, 5. ज़ब्ते-मुहब्बत=प्रेम की सहनशीलता, 6. दरो-दीवार=दरवाज़ा और दीवार, 7. चमनज़ार=बाग़, उद्यान।
(समन्दर के दायरे से)
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