101. जब भी आवारा कोई अब्र गुज़र जाता है
जब भी आवारा कोई अब्र गुज़र जाता है
छाँव बनके ये ही ख़ुर्शीद बिख़र जाता है
उनके मिलने से तो कुछ होता नहीं इसके सिवा
चन्द लम्हों के लिए ज़ख़्म-सा भर जाता है
दोस्तो ! तुम दरे-मैख़ाना खुला मत छोड़ो
मय के पीने से मेरा नश्शा उतर जाता है
रहगुज़ारों की सभी रोशनियाँ गुल कर दो
दिल इधर आता है, देखें कि उधर जाता है
नाव खेते रहो तूफ़ाने-बला में "माँझी"
जिस्म मौजों के थपेड़ों से निखर जाता है
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. अब्र=बादल, 2. ख़ुर्शीद=सूरज, 3. लम्हों=पल, क्षण, 4. दरे-मैख़ान=मधुशाला या बार का दरवाज़ा, 5. नश्शा=नशा, 6. तूफ़ाने-बला=भयानक तूफ़ान, 7. मौजो=लहरों।
(समन्दर के दायरे से )
No comments:
Post a Comment