126. मुझे तन्हाई में घेरे खड़े हैं
मुझे तन्हाई में घेरे खड़े हैं
ये साये दोस्तो जिद्दी बड़े हैं
बढ़ा लो क़ाफ़िला आगे यहाँ से
यहाँ तो ख़ून के धब्बे पड़े हैं
तअ़ल्लुक़-तर्क हमसे भी किया है
वो अपने-आपसे ऐसे लड़े हैं
समन्दर भी गुज़र जाता है सर से
वो इस अंदाज़ के चिकने घड़े हैं
सितारे आस्माँ को लग रहे हैं
जो गौहर ताज में उनके जड़े हैं
ये "माँझी" नाख़ुदा भी जानता है
मराहिल ज़िन्दगानी के कड़े हैं
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. तअ़ल्लुक़-तर्क=सम्बन्ध विच्छेद, 2. गौहर=मोती, 3. मराहिल ज़िन्दगानी के=जीवन की अवस्थाएँ, ज़िन्दगी के पड़ाव, मंज़िलें।
("समन्दर के दायरे" से)
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