96. ख़ुद ही तज्वीज़ की दवा हमने
ख़ुद ही तज्वीज़ की दवा हमने
ज़ख़्मे-दिल को छुपा लिया हमने
सारी दुनिया ही हो गई बरहम
जबसे तुमको भुला दिया हमने
अब भी चेहरे हैं उनके गर्द-आलूद
आईना जब दिखा दिया हमने
हमको काफ़िर समझ रहे हैं लोग
सर झुकाकर बुरा किया हमने
तेरी आतिश-परस्त यादों से
आशियाना जला लिया हमने
नाव खेते रहो अभी "माँझी"
पार दरिया नहीं किया हमने
-देवेन्द्र माँझी
(समन्दर के दायरे से )
शब्दार्थ--1. तज्वीज़=निर्धारित, तय, 2. ज़ख़्मे-दिल=हृदय का घाव, 3. बरहम=अप्रसन्न, नाराज, 4. गर्द-आलू=धूल से अटा हुआ, 5. आतिश-परस्त यादों से=आग की तरह झुलसा देनेवाली यादों से, 6. आशियाना=घौंसला, अपना घर।
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