106. क्या ख़बर थी ऐसी राहों से गुज़ारोगे मुझे
क्या ख़बर थी ऐसी राहों से गुज़ारोगे मुझे
साये की मानिन्द शीशे में उतारोगे मुझे
शमअ़ की सूरत जलेंगे नक़्शे-पा
तुम अँधेरे मोड़ पर जब भी पुकारोगे मुझे
मैं उन्हीं शतरंज के मोहरों में गुम हो जाऊँगा
जीत की बाज़ी समझकर तुम जो हारोगे मुझे
जानता था ऐ मेरे दुश्मन ख़यालों के हुजूम
एक दिन चट्टान से टकराके मारोगे मुझे
तुमको अपने आईने में अपना रहता है ख़याल
मैं बिगड़ता जा रहा हूँ कब सँवारोगे मुझे
एक दिन "माँझी" इन्हीं लहरों के बीच
लाके तूफाँ इस समन्दर में निखारोगे मुझे
देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-- 1. साये की मानिन्द=परछाईं की तरह, 2. नक़्शे-पा=पाँव के निशान, 3. हुजूम=भीड़।
(यह ग़ज़ल मेरे मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से है, जिसका प्रकाशन आज से तीस साल पहले 1985 में हुआ था )
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