102. सामने वो जब मेरे आया न था
सामने वो जब मेरे आया न था
दिल ने शायद ज़ख़्म भी खाया न था
ज़िन्दगी कड़वाहटों का नाम है
इससे पहले ज़ायक़ा पाया न था
साज़ की धुन पर अय जाने-आरज़ू
प्यार का नग़मा कभी गया न था
आज जाने क्या हुआ चुप साध ली
सामने वो ऐसा शरमाया न था
तूने दिल के टुकड़े-टुकड़े कर दिए
तेरा कहना जबकि लौटाया न था
जो मुक़द्दर में लिखा था हो गया
बाखुदा उसने सितम ढाया न था
ख़ुद-ब-ख़ुद साहिल पे आकर लग गयी
कोई "माँझी" नाव को लाया न था
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. ज़ायक़ा=स्वाद, 2. जाने-आरज़ू=चाहत की जान अर्थात प्रेयसी, 3. बाखुदा=भगवान की सौगन्ध, 4. सितम=अत्याचार, 5. साहिल=किनारा।
(समन्दर के दायरे से)
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