124. शामे-रफ़्ता के धुंधलकों को मिटा दे कोई
शामे-रफ़्ता के धुंधलकों को मिटा दे कोई
शमअ़ इस घोर अँधेरे में जला दे कोई
मैं तो अनजान मुसाफ़िर हूँ भटकनेवाला
मेरी मंज़िल का पता हो तो बता दे कोई
क़ैदे-तन्हाई में घुट-घुट के न मर जाऊँ कहीं
उनकी महफ़िल में मेरा हाल सुना दे कोई
कितने रंगीन हैं फ़ुर्क़त के भयानक मंज़र
मेरी आँखों से उन आँखों को दिखा दे कोई
बीच तूफ़ाँ के कोई चीख़ रहा है "माँझी"
मेरी कश्ती को किनारे से लगा दे कोई
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. शामे-रफ़्ता=गुज़री हुई शाम, बीती शाम, 2. क़ैदे-तन्हाई=अकेलेपन की क़ैद, 3. फ़ुर्क़त=जुदाई, वियोग, 4. मंज़र =दृश्य।
("समन्दर के दायरे" से)
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