98. जब ख़यालों में तेरा नक़्श उभर आता है
जब ख़यालों में तेरा नक़्श उभर आता है
चौदहवीं-रात के मानिन्द निखर आता है
मेरे अरमानों की दुनिया को जलाने के लिए
कोरे काग़ज़ पे कोई लेके ख़बर आता है
ये बता दो मुझे मुँह फेर के जाने वालो
दिल मेरा देखके क्यों आपको भर आता है
मान ले वहशते-दिल इतना कहा तो दिल का
सुबह का भुला हुआ शाम को घर आता है
दर्दे-उल्फ़त की दवा किससे कहाँ ले "माँझी"
शहर का शहर ही बीमार नज़र आता है
-देवेन्द्र माँझी
(समन्दर के दायरे से )
शब्दार्थ--1.नक़्श=चेहरा, 2. चौदहवीं-रात=पूनम की रात, 3 . मानिन्द=की तरह, 4. वहशते-दि=हृदय की घबराहट, दिल का पागलपन, 5. दर्दे-उल्फ़त=प्रेम का दुःख।
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