121. सामने मुस्कुरा रहा है कोई
सामने मुस्कुरा रहा है कोई
दिल पे बिजली गिरा रहा है कोई
रो रहे हैं ये कूचा-ओ-बाज़ार
शहर में ज़ुल्म ढा रहा है कोई
जिस्म जब जल चुका है धूपों से
अब घटा बनके छा रहा है कोई
जाने वालों की भीड़ में तनहा
तेज़ क़दमों से आ रहा है कोई
चौदहवीं रात के झरोखे से
अपना चेहरा दिखा रहा है कोई
नाव साहिल से "माँझी" दूर रहे
इस नदी में नहा रहा है कोई
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. कूचा-ओ-बाज़ार =गली और बाज़ार, 2. साहिल=किनारा।
("समन्दर के दायरे" से )
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