95. ये हक़ीक़त है दिले-नाशाद तू
ये हक़ीक़त है दिले-नाशाद तू
मैं रहा बर्बाद और आबाद तू
ये तो पत्थर-दिल हैं इनसे दूर हट
कर ख़ुदा के सामने फ़रियाद तू
चाहता है ग़म की दुनिया से मफ़र
उम्र-भर होगा नहीं आज़ाद तू
बालो-पर जब नॉच डाले सब मेरे
खोलता है अब क़फ़स सैयाद तू
जिस पे इक छोटा-सा घर हो जीस्त का
रख हवाओं पे कोई बुनियाद तू
क़स्रे-शीरीं में नहीं ज़ुह्रा-जमाल
क्या करेगा बनके अब फ़रहाद तू
ग़मज़दा "माँझी" को दरियाओं के बीच
बारहा आता रहा है याद तू
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. दिले-नाशाद=दुःखी मन, 2. फ़रियाद=विनती, 3. मफ़र=बचाव, पलायन, 4. बालो-पर=पंख और डैने, 5. क़फ़स=पिंजरा, 6. सैयाद=शिकारी, 7. जीस्त=जीवन, ज़िन्दगी, 8. बुनियाद=नींव, 9. फ़रहाद की प्रेमिका शीरीं का महल, 10. ज़ुह्रा-जमाल=चन्द्रमुखी, परी-जैसी ख़ूबसूरत, 11. ग़मज़दा=दुःखी, 12. बार-बार, हर समय।
नोट--यह ग़ज़ल मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से है, जिसका प्रकाशन 1985 में हुआ था।
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