117. गिरा के बिजली मेरा आशियाँ जलाना था
गिरा के बिजली मेरा आशियाँ जलाना था
तुझे भी आज सरे-बज़्म मुस्कुराना था
मैं इन्तिज़ार मैं बैठा हुआ हूँ बरसों से
पलट के उनको इन्हीं रास्तों पे आना था
हयात बख़्शने वाले बुरा किया तूने
मुझे तो हर्फ़े-ग़लत की तरह मिटाना था
समझ के क्या ये दो-राहे पे रौशनी की है
गली के मोड़ पर तुझको दिया जलाना था
सहल नहीं है ये पानी को काटना "मांझी"
नदी के बीच में कश्ती को साथ लाना था
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. आशियाँ=दिल रूपी घोंसला, 2. हयात बख़्शनेवाले=जीवन देनेवाले, 3. हर्फ़े-ग़लत=अनैच्छिक शब्द, 4. सहल=सरल,आसान।
("समन्दर के दायरे" से )
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