125. ये शहर चढ़ती रात में चीखों से भर गया
ये शहर चढ़ती रात में चीखों से भर गया
ख़्वाबों में कोई अजनबी सूरत से डर गया
अश्कों से हो गया मेरा दामन लहू-लुहान
सीने में तेरी याद का ख़ंजर उतर गया
बैठेंगे लोग मेरी तरह किसकी छाँव में
बूढ़ा शजर हवाओं की ज़द में बिख़र गया
उम्मीद की तो शाख भी पड़ने लगी है ज़र्द
क्या दरम्याँ से बाग़ के पतझड़ गुज़र गया
"माँझी" ये नाव किस तरह साहिल पे आ गयी
तूफ़ान-ए-तुन्द तेज़ का झौंका किधर गया
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. अश्कों से=आँसुओं से, 2. शजर=पेड़, 3. ज़र्द =पीली, 4. तूफ़ान-ए-तुन्द तेज़=भयानक तूफान।
("समंदर के दायरे" से).
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