133. जब हो ढलती रात का पहरा
जब हो ढलती रात का पहरा
क्यों न टूटे ख़्वाब सुनहरा
कोई किसी को क्या पहचाने
चेहरे पर जब धुँधला चेहरा
किसको सुनायें हम फरियादें
सारा चमन है गूँगा-बहरा
रात की नागिन जैसी ज़ुल्फ़ें
सन्नाटे हैं बीन का लहरा
"माँझी" ये तो आप बताएँ
सागर है ये कितना गहरा
-देवेन्द्र माँझी
(समन्दर के दायरे से)
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